Prabhat Ranjan

इंटरव्यू – प्रभात रंजन

  1. अपनी पुस्तक लिखने की यात्रा के बारे में कुछ बतायें।
    • मेरी पहली पुस्तक ‘दोस्ती और प्यार’ है। यह सन् 1993 में हाजीपुर के एक प्रकाशन-संस्था द्वारा प्रकाशित हुई थी। दरअसल, यह उपन्यास मैंने खेल-खेल में, सात दिनों की छुट्टी में लिख डाला था। मगर यह बेहद सरस और मनोरंजक था, इसीलिए दोस्तों के कहने पर इसे प्रकाशित भी करवा लिया। इसके बाद मेरी मश़रुफ़ियत दिल्ली दूरदर्शन के लिए टेलीफिल्म और सीरियल लिखने में हो गई। बाद में फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय हो गया। दरअसल, लेखन की भूख पुस्तक-लेखन से ही मिट सकती है, क्योंकि यहाँ लेखक पूरी तरह स्वतंत्र होता है और यहां पूरी-पूरी क्रेडिट का लेखक अकेला हकदार होता है। इसीलिए बीच-बीच में समय निकाल कर मैं किताबें भी लिखता रहा। एक नई प्रेमकहानी, सितारों के पार: गुलशन कुमार, कोशी पीड़ित की डायरी के बाद ‘रेड अलर्ट’ मेरी ताजातरीन रचना है, जिसे अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद ने प्रकाशित किया है। यह अमेजन, किन्डल, मार्क माइ बुक आदि वेबसाइट पर उपलब्ध है।
  2. अपनी किताब के बारे में कुछ बताइये।
    • दोस्ती और प्यार’ अपने शीर्षक के मुताबिक दोस्ती और प्यार के रिश्ते में त्याग और समर्पण की कहानी है। एक दुर्घटना दो हमशक्लों को एक-दूसरे की ज़िन्दगी में ले आती है। दोनों में दोस्ती हो जाती है। इसमें कहा गया है कि इन रिश्तों को अगर मजबूती देनी है तो त्याग और समर्पण को महत्व दें। हो सकता है कि आपका त्याग और समर्पण आपको इससे भी बड़ी चीज दे जाये।

एक नई प्रेमकहानी एक मनुष्य और एक जिन्न की प्रेमकहानी पर आधारित है। नायिका जिन्नलोक से इस शर्त पर अपने प्रेमी से मिलने धरती पर आती है कि वह किसी मनुष्य को कोई नुकसान नहीं पहुँचायेगी और उसे अपनी असलियत छिपा कर रखनी होगी। जिस दिन उसने किसी मनुष्य को नुकसान पहुँचाया, उसकी जादुई शक्ति छीन जायेगी और जिस दिन उसकी असलियत खुलेगी, उसे वापस आना होगा। हालात ऐसे बनते हैं कि अनजाने में वह अपने पति को ही नुकसान पहुँचा देती है। उसे महसूस होता है कि मानव-समुदाय की सामाजिक व्यवस्था और मान्यताओं की शर्त वह पूरी नहीं कर पायेगी और उसके कारण उसके पति को कई अभाव और दुख-तकलीफ़ से गुजरना पड़ेगा। इसीलिए वह अपनी स्वेच्छा से अपनी असलियत अपने पति को बता देती है।

सितारों के पार:गुलशन कुमार गुलशन कुमार की जीवनी, उनके सँघर्ष और उनकी कार्यशैली पर आधारित पुस्तक है, जिसमें उनके बारे में गीतकार फ़ैज अनवर, गायक उदित नारायण, सोनू निगम , यशवंत सिंह, बाबला मेहता, बेला सुलाखे (गले में लाल टाई फेम) आदि के लेख शामिल किये गए हैं। कोशी पीड़ित की डायरी सन् 2008 के कुसहा जल-प्रलय की दास्तान है और रेड अलर्ट इस सँसार के पिछली एक सदी की यात्रा पर आधारित है, जिसमें चर्चा की गई है कि हम(मानव-समुदाय) कहाँ से चले थे, कहाँ जाना था और अब हम दरअसल कहाँ जा रहे हैं? इस संसार की भलाई के लिए हमें अपने-आप में क्या परिवर्तन लाना चाहिए।

3.यह कहा जाता है कि लेखक एक और रचनाकार होते हैं, क्या आप इससे सहमत हैं?

– इस दुनिया में, लोग जिन्दगी को जीते और मर जाते हैं। लेखक अपनी ज़िन्दगी जीते हुए इस दुनिया की घटनाओं-मान्यताओं, सोच-परिस्थितियों को जीते हुए उनसे प्रभावित-प्रेरित होकर एक नई दुनिया का सृजन करता है। इस हिसाब से आपका सवाल जायज है, लेकिन रचनाकारों को इस तरह का श्रेय लेने से कतराना चाहिए।

4.परिवार के अलावा आपकी प्रेरणा?

मेरी प्रेरणा हमेशा मेरी परिस्थितियां ही रही हैं।

  1. अपने बारे में कुछ बताइये।

बिहार के मधेपुरा जिला के एक मध्यम वर्गीय परिवार में मेरा जन्म हुआ। पिताजी डॉक्टर बनाना चाहते थे, लेकिन किसी रोते-कराहते आदमी, बहते हुए खून, ज़ख्म आदि को देखने की मुझमें क्षमता नहीं है। घर में किसी भी मसले पर अपना नज़रिया रखने की आजादी नहीं थी, इसीलिए घर में बगावत करके लेखक बनना पड़ा। शुरुआती दौर में थोड़े-बहुत सँघर्ष के बाद अच्छे दिन आ गये। लेखन-कार्य से अच्छी आमदनी होने लगी, तो परिवार ने फिर खुशी-खुशी अपना लिया। इसके बाद ज़िन्दगी में काफी उतार-चढ़ाव आये, मगर अब तक लेखन ही मेरा पूर्णकालीन पेशा है और अब मरते दम तक यही रहेगा।

6.खुद की पुस्तक पकड़कर/पढ़कर एक विशेष भावना होती है। आपके लिए यह कैसा अहसास था।?

शुरू में मुझे लगा था कि मैं ही ‘तुर्रमखां’ हूँ। उस समय मेरी उम्र सिर्फ बीस साल की थी। ज़माना भी आज के समय से विरल था – लिखने-छपने को बड़ी बात मानी जाती थी। मगर, ज्यों-ज्यों लेखन का दायरा बढ़ा। दूर की देश-दुनिया को देखने-समझने का मौका मिलता गया, मेरे अंदर के तुर्रमखां की सेहत खराब होती गई। अब वह शहीद हो चुका है। इस दुनिया के अलग-अलग क्षेत्र में एक से बढ़कर एक प्रतिभायें हैं। अब उनके करामात देखकर अपना कद हमेशा बौना ही दिखता है।

7.पसंदीदा लेखक कौन हैं और आपकी पसंदीदा पुस्तक क्या है?

बहुत साल पहले गुलशन नंदा और वेदप्रकाश शर्मा को नियमित पढ़ता था। धर्मवीर भारती की ‘गुनाहों का देवता’ बहुत पसंद आयी थी। अब ज्यादातर नई पीढ़ी के लेखकों को पढ़ता हूँ।

  1. 8. पाठक की अच्छीबुरी प्रतिक्रियाओं की कुछ याद साझा करें।

–पाठकों की प्रतिक्रियाएं शुरुआती दौर के एक-दो किताबों की साज-सज्जा को लेकर आयी थी। रेड अलर्ट की साज-सज्जा को लेकर ऐसी कोई शिकायत नहीं आयी। जहाँ तक कन्टेंट और प्रेजेंटेशन से संबंधित प्रतिक्रियाओं का सवाल है, तो यह आपके पाठकों का हक है। कहीं आप ग़लत होते हैं, तो कहीं पाठकों का नज़रिया आपसे अलग होता है। ‘रेड अलर्ट’ के लिए अमेजन पर ज्यादातर अच्छी प्रतिक्रियाएं आयी हैं। अब तक बुरी प्रतिक्रियाएं तो नहीं आयी हैं, मगर पाठकों ने जो सुझाव दिये हैं, मैं उनसे सहमत हूँ और उनके प्रति आभार व्यक्त करता हूँ।

  1. अन्य शौक क्या हैं?

मैंने अपने पिछले पाँच बर्ष बुरे सेहत के साथ गुजारे हैं। सोचा था, अब सबकुछ खत्म हो गया।, मगर ज़िन्दगी को शायद अभी मुझसे और बहुत कुछ करवाना है, इसलिए फिर से सक्रिय हो गया हूँ। मेरे अच्छे दौर में ज़िन्दगी ने मेरे शौक और मेरी चाहत से बढ़कर मुझे दिया, इसीलिए अब कोई खास शौक नहीं हैं। बस, लिखते-पढ़ते, हँसते-गाते जान छूटे!

10.लेखन की अगली योजना क्या है?

संभवतः दो-चार दिनों में अगली रचना (उपन्यास) को KDP Contest 2018 के लिए किन्डल पर प्रकाशित कर दिया जायेगा। इसमें कुछ काम अधूरा है, इसीलिए इस संदर्भ में ज्यादा चर्चा नहीं की जा सकती। इसके बाद अपनी पुरानी किताबों को किन्डल पर प्रकाशित करने के साथ-साथ अपने एक अति-महत्वाकांक्षी उपन्यास को मई ‘19’ के आखिरी सप्ताह तक प्रकाशित करने की योजना है।

10.आपको कभी लगता है कि लेखन कठिन है?

मुझे लेखन कभी कठिन नहीं लगा। शायद यह लक्षण जन्म के साथ ही मेरे साथ आया है। लेकिन जब आप अपने पाठकों के लिए, उनकी पसंद-नापसंद को ध्यान में रखते हुए उन्हें संतुष्ट करने के लिए लिखना हो, तो इसके लिए इसे चुनौतीपूर्ण मानकर खुद चुनौतियों को स्वीकार कर लेनी चाहिए।

12.आपने पहली बार कब महसूस किया था कि भाषा में दिलों को बाँधने की शक्ति होती है ?

मैं जब पाँचवीं क्लास में था तो मैंने अपने एक सेवा-निवृत्त हो रहे शिक्षक के लिए कविता लिखी थी। हलाँकि इससे पहले अपने सहपाठियों को हँसाने के लिए कई फिकरे गढ़े थे। मगर मेरी कविता ने सबको रुला दिया था। अब कविता मुझे याद नहीं है, लेकिन मैं उस कविता की वजह से आज भी याद किया जाता हूँ।

13.आप किस शैली में लिखना पसंद करते हैं?

मैं अब तक विजुअल मीडिया के लिए तकरीबन हर शैली में लिख चुका हूँ। अब मेरा स्टैंड बिल्कुल क्लियर है – मैं जो लिखूं , उसका मकसद ‘सिर्फ मनोरंजन’ न हो और मेरी हर रचना पर हर व्यक्ति अपने पूरे परिवार के साथ चर्चा कर सकें। मेरी रचनाओं में बताने के लिए बहुत कुछ हो, छिपाने के लिए कुछ नहीं।

  1. लिखते समय और प्रकाशित होते समय आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा ?

पहली किताब की पांडुलिपि को दिल्ली के कुछ पॉकेट बुक्स में घुमाया था, मगर उस समय घोस्ट-राइटिंग का प्रचलन अपने पूरे शबाब पर था। मुझे कुछ प्रकाशकों द्वारा बरगलाया गया। अंततः मैंने एक छोटे प्रकाशन से ही इसे प्रकाशित करवाया। बाद की दो-तीन किताबें सेल्फ-पब्लिशिंग की है। ‘रेड अलर्ट’ में सबकुछ वरदान की तरह मिलता गया। अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद के साथ सब अच्छा चल रहा है।

  1. आपके प्यारे पाठकों के लिए कुछ शब्द।

यह जीवन बहुत छोटा है। इसमें नाना प्रकार की दुख-तकलीफें, सुख-दुख, हँसी-खुशी हैं। अनेक परिस्थितियां और अनेक मुकाम हैं। यह सब सिर्फ आपके साथ नहीं है। जीने और पाने की लालसा में जिस दिन आपने इंसानियत का साथ छोड़ दिया, आप मानें या न मानें, पर मेरी सलाह है कि आप मान ही लें – आपने ‘पाने’ के लालच में ‘गँवाने’ की राह पकड़ ली है। मृत्युशैय्या पर इन दिनों को याद कर-करके रोने से बेहतर है, आज ही अपने भले-बुरे की समीक्षा करते चलें और हर हाल में एक इंसान बने रहें।

धन्यवाद 🙏🙏🙏

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